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श्री निसर्गदत महाराज – “मैं हूँ” की अनुभूति (चेतना)

जब मैं अपने गुरु से मिला, उन्होने मुझे बताया: "तुम वह नहीं हो जो तुम स्वयं को समझ रहे हो । ये पता करो कि तुम असल में क्या हो । "मैं हूँ" की अनुभूति पर ध्यान रखो, अपने असली स्वरूप को ढ़ूंढो ।

 

मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया, क्योंकि मुझे उनपर विशवास था । मैंने वैसा ही किया जैसा उन्होने कहा । अपना सारा खाली समय मैं शान्ति से स्वयं को देखता रहता । और इसका कितना बड़ा नतीजा निकला, और कितनी जल्दि!

 

मेरे गुरु ने “मैं हूँ” के बोध को दृढ़ता से पकड़े रखने को कहा, और इससे बिल्कूल भी ना हटने को कहा, एक क्षण के लिये भी नहीं । मैंने अपनी पूरी योग्यता से उनके उपदेश की पालना की, और थोड़े ही समय में, मैंने अपने अन्दर उनके उपदेश की सच्चाई को जान लिया । मैंने सिर्फ इतना किया कि उनके उपदेश, उनके चेहरे, तथा उनके शब्दों को निरंतर याद रखा । इससे मन का अंत हो गया; तथा अचल मन की दशा में मुझे अपने असली स्वरूप के दर्शन हूए – असीम

 

मैंने सिर्फ़ अपने गुरु के निर्देश का पालन किया, जोकि था मन को शुद्ध अस्तित्व "मैं हूँ" पर केन्द्रित करना, तथा उसी स्थिति में रहना । मैं एक बार में घंटो तक बैठा रहता, केवल "मैं हूँ" की अनुभूति अपने ध्यान में रखकर, और जल्दि ही शान्ति तथा आनन्द और एक गहरा सर्व-व्यापक प्रेम मेरी सामान्य स्थिति बन गई । उसमें सब खो गया -- मैं, मेरा गुरु, जो जीवन मैंने जीया, मेरे चारों ओर का संसार । सिर्फ़ शान्ति बची और अथाह सन्नाटा ।

 

अभ्यास करने को कुछ नहीं है । स्वयं को जानने के लिये, स्वयं बनो । स्वयं बनने के लिये, स्वयं के ये या वो होने की कल्पना करना बंद करो । सिर्फ़ रहो । अपने असली स्वभाव को प्रकट होने दो । खोज से अपने मन को परेशान मत करो ।

जब मैं अपने गुरु से मिला, उन्होने मुझे बताया: "तुम वह नहीं हो जो तुम स्वयं को समझ रहे हो । ये पता करो कि तुम असल में क्या हो । "मैं हूँ" की अनुभूति पर ध्यान रखो, अपने असली स्वरूप को ढ़ूंढो ।

 

मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया, क्योंकि मुझे उनपर विशवास था । मैंने वैसा ही किया जैसा उन्होने कहा । अपना सारा खाली समय मैं शान्ति से स्वयं को देखता रहता । और इसका कितना बड़ा नतीजा निकला, और कितनी जल्दि!

 

मेरे गुरु ने “मैं हूँ” के बोध को दृढ़ता से पकड़े रखने को कहा, और इससे बिल्कूल भी ना हटने को कहा, एक क्षण के लिये भी नहीं । मैंने अपनी पूरी योग्यता से उनके उपदेश की पालना की, और थोड़े ही समय में, मैंने अपने अन्दर उनके उपदेश की सच्चाई को जान लिया । मैंने सिर्फ इतना किया कि उनके उपदेश, उनके चेहरे, तथा उनके शब्दों को निरंतर याद रखा । इससे मन का अंत हो गया; तथा अचल मन की दशा में मुझे अपने असली स्वरूप के दर्शन हूए – असीम

 

मैंने सिर्फ़ अपने गुरु के निर्देश का पालन किया, जोकि था मन को शुद्ध अस्तित्व "मैं हूँ" पर केन्द्रित करना, तथा उसी स्थिति में रहना । मैं एक बार में घंटो तक बैठा रहता, केवल "मैं हूँ" की अनुभूति अपने ध्यान में रखकर, और जल्दि ही शान्ति तथा आनन्द और एक गहरा सर्व-व्यापक प्रेम मेरी सामान्य स्थिति बन गई । उसमें सब खो गया -- मैं, मेरा गुरु, जो जीवन मैंने जीया, मेरे चारों ओर का संसार । सिर्फ़ शान्ति बची और अथाह सन्नाटा ।

 

अभ्यास करने को कुछ नहीं है । स्वयं को जानने के लिये, स्वयं बनो । स्वयं बनने के लिये, स्वयं के ये या वो होने की कल्पना करना बंद करो । सिर्फ़ रहो । अपने असली स्वभाव को प्रकट होने दो । खोज से अपने मन को परेशान मत करो ।

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